
हरीश थपलियाल टीवी पत्रकार
देहरादून। हरिद्वार जिले में तैनात एक कानूनगो को लेकर प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि कई आपराधिक मामलों में नाम आने और अदालत में प्रकरण लंबित होने के बावजूद संबंधित अधिकारी के खिलाफ कोई ठोस प्रशासनिक कार्रवाई नहीं की जा रही, जिससे शासन की जीरो टॉलरेंस नीति की प्रभावशीलता पर सवाल उठने लगे हैं।
जानकारी के अनुसार, लक्सर तहसील में तैनात कानूनगो रमेश चंद के खिलाफ धोखाधड़ी, जालसाजी और दस्तावेजों में कथित हेरफेर जैसे गंभीर आरोप लगे हैं। इन मामलों में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 420, 467, 468 और 471 के तहत मुकदमे दर्ज बताए जा रहे हैं। आरोप है कि उन्होंने किसी अन्य व्यक्ति की जमीन दिखाकर करीब 95 लाख रुपये की ठगी की। मामले में चार्जशीट दाखिल होने की बात भी सामने आई है और प्रकरण वर्तमान में न्यायालय में विचाराधीन है।
सबसे अहम सवाल यह उठ रहा है कि जिन अधिकारियों के खिलाफ उसी जनपद में आपराधिक मामले दर्ज हों, उन्हें वहीं दोबारा तैनाती कैसे मिल जाती है। चर्चा है कि संबंधित कानूनगो को पहले नैनीताल में तैनाती दी गई थी, लेकिन बाद में फिर हरिद्वार में ही मनचाही पोस्टिंग मिल गई। इसे लेकर प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं।
विवाद का दायरा यहीं तक सीमित नहीं है। बहुचर्चित नगर निगम भूमि प्रकरण में भी इस कानूनगो की भूमिका को लेकर संदेह जताया जाता रहा है। आरोप है कि कुछ मामलों में कार्रवाई असामान्य रूप से तेजी से की गई, जिससे निष्पक्षता पर सवाल खड़े हुए। इसके अलावा एक लेखपाल के साथ करीबी संबंधों को लेकर भी चर्चाएं हैं, जिसकी जमीन नगर निगम द्वारा खरीदे जाने की बात कही जा रही है। हालांकि, जांच में इन पहलुओं पर अपेक्षित गहराई से ध्यान नहीं दिए जाने की भी चर्चा है।
हाल ही में लक्सर क्षेत्र में एक अधिवक्ता के साथ मारपीट और अभद्रता के मामले में भी संबंधित कानूनगो के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं 115, 351 और 352 के तहत मुकदमा दर्ज हुआ है। लगातार सामने आ रहे मामलों के बावजूद प्रशासनिक स्तर पर सख्त कार्रवाई का अभाव आम लोगों और कानूनी समुदाय के बीच चिंता का विषय बनता जा रहा है।
पीड़ित पक्षों ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है और कानूनी प्रक्रिया जारी है, लेकिन प्रशासनिक निष्पक्षता को लेकर संशय बना हुआ है। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या इन मामलों की पूरी जानकारी शासन-प्रशासन को नहीं है या फिर किसी प्रभावशाली संरक्षण के चलते कार्रवाई प्रभावित हो रही है।
अब सभी की निगाहें इस पर टिकी हैं कि सरकार और संबंधित विभाग इन आरोपों पर क्या रुख अपनाते हैं। क्या जीरो टॉलरेंस नीति के तहत सख्त कार्रवाई की जाएगी या यह मामला भी अन्य विवादों की तरह समय के साथ ठंडे बस्ते में चला जाएगा यह आने वाला समय ही तय करेगा।